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कितना प्रासंगिक है कलेक्टर मनीष सिंह का उज्जैन से जाना

कितना प्रासंगिक है कलेक्टर मनीष सिंह का उज्जैन से जाना

  09 Jan 2019

पूर्ववर्ती शिवराज सरकार पर भी सवाल-क्यों भेजा था मनीष सिंह को कलेक्टर बनाकर उज्जैन?

उज्जैन। शनिश्चरी अमावस्या पर अत्यधिक धार्मिक महत्व के शिप्रा के त्रिवेणी घाट पर आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के स्नान के लिए पानी की व्यवस्था नहीं कर पाने और कान्ह नदी के गंदे, कीचड़युक्त पानी में फव्वारे लगाकर स्नान कराने के मामले में हटाए गए कलेक्टर मनीष सिंह के जाने को लेकर दो तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कुछ लोग उनको हटाये जाने को ठीक नहीं मान रहे हैं और उनकी मिशन के रूप में काम करने की शैली का तर्क देकर कह रहे हैं कि उज्जैन विकास के मामले में पिछड़ जाएगा तो कुछ लोग कलेक्टर मनीष सिंह की रवानगी को उज्जैन के लिए बेहतर मान रहे हैं।ऐसे में कलेक्टर मनीष सिंह के कार्यकाल का आकलन और विश्लेषण करना प्रासंगिक हो जाता है। मनीष सिंह बतौर कलेक्टर करीब 9 महीने उज्जैन में रहे लेकिन इन 9 महीनों के कार्यकाल में उनके द्वारा विधानसभा चुनाव अच्छे से संपन्न कराने के अलावा एक भी ऐसा कार्य नहीं किया गया जिससे शहर की प्रतिष्ठा बढ़ी हो। यही नहीं उज्जैन को कोई नई सौगात दिला पाने में भी वे नाकाम रहेे। हालांकि इसमें पूर्ववर्ती शिवराज सरकार की गलती रही।अमूमन प्रमोट होकर कलेक्टर बनने वाले किसी भी राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को छोटा जिला दिया जाता है ताकि उसे कलेक्टरी का अच्छा खासा अनुभव हो सके पर मनीष सिंह के मामले में शिवराज सरकार फेल रही। मनीष सिंह को पहली कलेक्टरी के दौरान उज्जैन जैसा बड़ा संभागीय मुख्यालय वाला जिला दे दिया गया जिसका परिणाम शहर को भुगतना पड़ा। चूंकि इससे पहले वे भोपाल और इंदौर में नगर निगम आयुक्त की भूमिका में रहे लिहाजा कलेक्टर बनने और उज्जैन जैसे बडे जिले का कलेक्टर बनाये जाने के बाद भी वे नगर निगम आयुक्त की भूमिका से बाहर नहीं निकल सके और कलेक्टर कार्यालय को भी उन्होंने नगरनिगम दफ्तर की तरह चलाया। उन्होंने शहर के लोगों के दुःख – दर्द, रोजी- रोटी, व्यापार-व्यवसाय और रोजगार की चिंता किये बिना कईयों के आशियाने,ठेले-गुमटी और दुकानें बगैर मुआवजे और रोजगार के नए विकल्प सृजित किये बगैर ही उजाड़ दिए।उज्जैन में बतौर कलेक्टर पदस्थ होने के शुरुआती दिनों में मनीष सिंह महाकाल और शहर के अन्य मंदिरों को ही अपनी ‘टेरेटरी’बनाये रहे और बेहतर व्यवस्था और विकास के नाम पर मनमानी करते रहे। नतीजा ये हुआ कि नागपंचमी व शनिश्चरी अमावस्या सहित शिव भक्ति के महीने श्रावण में श्रद्धालुओ की फजीहत हो गई और उनकी श्रद्धा और आस्था की अनदेखी गई। नागपंचमी पर तो महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं को 6-6 घँटे में दर्शन हुये और ऐसा पहली बार हुआ।प्रशासनिक अनदेखी और अकर्मण्यता का ही नतीजा रहा कि शनिश्चरी अमावस्या पर हजारों श्रद्धालुओं को गंदे और कीचड़युक्त पानी से स्नान करना पड़ा और कई बगैर स्नान के ही रवाना हो गए।कइयों ने तो यह कसम खाई कि अब त्रिवेणी स्नान करने कभी नहीं आएंगे।
बोलचाल और अपनी अलग तरह की कार्यशैली के दौरान कलेक्टर मनीष सिंह अक्सर अपनी प्रशासनिक मर्यादा लांघ जाते थे।महाकाल मन्दिर में कर्मचारियों सहित मंदिर परिसर स्थित कई मंदिरों के पुजारियों के साथ उन्होंने अभद्रता की और चुटकी बजाते हुए ये अहसास कराने से भी नहीं चूके कि मंदिर हमारी(कलेक्टर) प्रॉपर्टी है। हम जब चाहे तब तुम लोगों को यहाँ से बेदखल कर सकते हैं और मंदिर परिसर में 100 साल से भी अधिक समय से रह रहे एक पुजारी परिवार को उन्होंने रंगदारी पूर्वक बेदखल किया भी। सच तो ये था कि अपने अधीनस्थों के साथ भी कलेक्टर बगैर गाली बात नहीं करते थे नतीजतन उनके अधीनस्थ भी कलेक्टर मनीष सिंह के व्यवहार से नाखुश थे।मंगलनाथ मंदिर में तो उन्होंने बुजुर्ग प्रबंधक के साथ ही मारपीट कर डाली। कलेक्टर रहते मनीष सिंह के व्यवहार और कार्य शैली से प्रशासन की कई बार किरकिरी हुई।प

मनीष सिंह के वनिस्पत उनके पूर्व के कलेक्टरों का कार्यकाल देखा जाए तो न्यूसेंस किसी के कार्यकाल में नहीं रहा बल्कि कुछ पूर्व कलेक्टर का कार्यकाल गौरवपूर्ण उपलब्धियों से भरा हुआ रहा।

मनीष सिंह से पहले रहे कलेक्टर संकेत भोंडवे ने दिव्यांग पार्क सहित शहर को कई सौगातें दी। उन्होंने दिव्यांगों के हित में कई विश्वस्तरीय काम किए। श्रद्धालुओं के लिए शानदार व्यवस्था किये जाने को लेकर उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर को कई राष्ट्रीय अवार्ड दिलवाए।उन्होंने दिव्यांगो का परिचय सम्मेलन और सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित कराया और शहर के हर वर्ग को आनंदक के रूप में उससे जोड़ा। उनके कार्यकाल में कोई साम्प्रदायिक तनाव भी नहीं रहा।

इसी तरह संकेत भोंडवे से पूर्व उज्जैन कलेक्टर रहे कवीन्द्र कियावत का कार्यकाल भी उपलब्धियों से भरा रहा। उनके कार्यकाल में सिंहस्थ का ऐतिहासिक व शानदार आयोजन हुआ और उन्होंने एक कुशल प्रशासक की छाप छोड़ी। साम्प्रदायिक घटनाओं को रोकने के लिए तुरंत कड़ा एक्शन लेना और खुद मैदान में कूदकर अपने अधीनस्थों में एक लीडर की भावना पैदा करना उनके व्यक्तित्व की निशानी रही। मिलनसारिता और उम्रदराज होने के बाद भी युवाओं जैसा जोश दिखाया और नए और पुराने उज्जैन को उन्होंने राहगीरी के नाम से सैर सपाटे की शानदार थीम दी और हर शहरवासी को इससे जोड़ा। वहीं उनसे पहले कलेक्टर रहीं एम गीता,बीएम शर्मा,नीरज मंडलोई, विवेक अग्रवाल का कार्यकाल भी संतोषजनक रहा। तुलनात्मक नजरिए से देखा जाए तो मनीष सिंह का 9 माह कार्यकाल उज्जैन के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उनके इस कार्यकाल में शहर को कोई भी नई सौगात नहीं मिली। बल्कि अक्खड़ रवैये,मिलनसारिता की कमी,जनप्रतिनिधियों सहित मंत्रियों तक के फोन नहीं उठाना और बाद में कॉल बैक तक नहीं करना ऐसे कई अवगुण थे जिसके आधार पर कहा जा सकता है उनका उज्जैन से जाना बेहतर ही रहा।हालांकि उनके जाने को न्याय के देवता शनिदेव का प्रकोप कहा जा रहा है लेकिन असलियत ये है उन तमाम लोगों की हाय भी उन्हें लगी जिनके उन्होंने बगैर मुआवजे के आशियाने तोड़ दिए और शहर के विकास के नाम पर ठेले और गुमटियां हटाकर रोजी रोटी का संकट खड़ा कर दिया।बहरहाल नए कलेक्टर शशांक मिश्रा से अब शहर को काफी उम्मीदें हैं। उनकी तेजी और कार्यशैली को लेकर मिले फीडबैक (मंदसौर और बैतूल)से एक बात स्पष्ट है वे उज्जैन के उम्दा कलेक्टर साबित होंगे।

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